कतरा कतरा भीगती जाती है पलके
लम्हा लम्हा याद आते जा रहे हो
मेरी ही गलफ़त थी की नाम ले बैठी तेरा
दिल ने तो कितना कहा ....लम्हा लम्हा याद आते जा रहे हो
मेरी ही गलफ़त थी की नाम ले बैठी तेरा
माना अनिवार्य है जुदाई तेरी नज़र में
फिर क्यूँ है यह तीव्र वेदना मेरे मनं में
दिल में उठती है चीख ....
जब महसूस करती हूँ ....
तुम्हारा मौन तुम्हारी दूरी
और अपनी बेबसी
फिर भी सो जाती हूँ लेकर डबडबायी आँखें
ह्रदय में समेटे स्वप्न और एक आशा .....
की कभी हम दोबारा साथ चलेगे
ज़िन्दगी की इसी डगर पर ......
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