Thursday, October 14, 2010

कतरा कतरा भीगती जाती है पलके

कतरा कतरा भीगती जाती  है पलके
लम्हा लम्हा याद आते जा रहे हो
मेरी ही गलफ़त थी की नाम ले बैठी तेरा
दिल ने तो कितना कहा ....
माना अनिवार्य है जुदाई तेरी नज़र में
फिर क्यूँ है यह तीव्र वेदना मेरे मनं में
दिल में उठती है चीख  ....
जब महसूस करती हूँ ....
तुम्हारा मौन तुम्हारी दूरी
और अपनी बेबसी
फिर भी  सो जाती हूँ लेकर डबडबायी आँखें
ह्रदय में समेटे स्वप्न और एक आशा .....
की कभी हम दोबारा साथ चलेगे
ज़िन्दगी  की इसी डगर पर ......

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